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प्यार, डेटिंग और आचार्य “ओशो” की नजर

Posted On: 13 Oct, 2010 Others में

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आज के इस ब्लॉग में वैसे लिखने को तो बहुत कुछ था लेकिन जैसा की मैंने अपने पिछले ब्लॉग में लिखा था कि मैं कुछ गंभीर ले कर आऊंगा तो इस बार मैं आपके समक्ष आचार्य रजनीश ओशो की नजर में प्यार, सेक्स और डेटिंग की अहमियत पर प्रकाश डालूंगा.

7104ltदोस्तों, प्यार तो दुनियां में सभी करते हैं, कुछ मनोरंजन के लिए तो कुछ जीवन भर साथ निभाने के लिए. कुछ को सफलता मिलती है तो कुछ इस आग की दरिया को पार नहीं कर पाते. प्यार करने से मुश्किल होता है प्यार के अहसास को समझ पाना, जो इस अहसास को समझ जाता है वह दुनियां में प्यार का ही दीवाना बन जाता है.

लेकिन आज प्यार एक ‘टेक एंड गिव’ का खेल हो गया है. इस लेन-देन का भी कुछ मजा है लेकिन सही जानकारी के अभाव में इसे भी अधिकतर लोग बर्बाद कर देते हैं. पर प्रेम को इस रुप में स्वीकार करने वाले युवा करें भी तो क्या जब उन्हें प्यार की सही परिभाषा मालूम ही नहीं. हीर-रांझा, लैला-मजनू सब को प्यार में जो मिला उससे युवाओं का मन दहल जाता है, आज का युवा शायद इतना ताकतवर नहीं रहा जो वह इन सब मुसीबतों को झेल सके.

बात है प्यार है क्या! कभी कभी मन में सवाल उठता है कि अधिक प्यार कौन करता है पुरुष या स्त्री? तो इस विषय में ओशो का कहना है “कुदरत का अनमोल तोहफा है प्रेम, ‘पुरुष, प्यार अक्सर और थोड़ा करता है, किंतु स्त्री, प्यार सौभाग्य से और स्थायी करती है.” वहीं ओशो प्यार में सेक्स को गलत नहीं मानते. उनका कहना है कि प्यार में सेक्स एक अहम कारक है जो प्यार की चाहत को और अधिक प्रबल बना देता है. उनका कहना है जब आपके अंदर किसी चीज की भूख हो तो उसे इतना खाओ कि भूख हमेशा के लिए मर जाए इस तरह आप एक परमांनद को प्राप्त करेंगे. जैसे प्यार के बीच अगर सेक्स की भूख हो तो इतना सेक्स करो कि प्यार का असली मजा प्राप्त होने लगे.

osho07आचार्य ओशो के अनुसार प्यार में नाचो, गाओ, संगीत बजाओ और सेक्स को मानसिक मत होने दो. मानसिक सेक्स प्रामाणिक नहीं  होता  है; सेक्स  सहज  होना  चाहिए. माहौल बनाओ. तुम्हारा सोने का कमरा  ऐसा  होना  चाहिए जैसे कि मंदिर हो. अपने सोने के कमरे में और  कुछ मत करो; गाओ और नाचो और खेलो, और यदि स्वतः प्रेम होता  है, सहज घटना की तरह, तो तुम अत्यधिक आश्चर्यचकित होओगे कि  जीवन ने तुम्हें ध्यान की झलक दे दी.  पुरुष और स्त्री के बीच रिश्ते में बहुत बड़ी क्रांति आने वाली है. पूरी दुनिया में विकसित देशों में ऐसे संस्थान हैं जो सिखाते हैं कि प्रेम कैसे करना. यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि  जानवर भी जानते हैं कि प्रेम कैसे करना, और आदमी को सीखना  पड़ता  है. और उनके सिखाने में बुनियादी बात है संभोग के पहले की  क्रीडा और उसके बाद की क्रीडा, फोरप्ले और ऑफ्टरप्ले.

यानि सरल शब्दों में रजनीश का कहना था प्यार खूब करो, खूब करो , अपने साथी को टूट कर प्यार करो. सिर्फ ऐसा करने से ही आप प्रेम की सही परिभाषा समझ सकते हैं वरना आप भी बाकियों की तरह प्रेम का मात्र एक छोटा सा अंश ही उपयोग में ला पाएंगे.

लेकिन दोस्तों आचार्य रजनीश “ओशो” की बात का गलत मतलब मत निकालिएगा, दरअसल उनका कहना था कि प्यार हमेशा पूरी दृढ़ता और सही मानसिकता से होना चाहिए. प्यार में अगर आपको अपने साथी से सेक्स की उम्मीद है तो इसमें गलत नहीं है लेकिन सिर्फ सेक्स के लिए प्यार बिलकुल गलत है. डेटिंग के समय यह पूरी तरह आप पर निर्भर करता है कि सेक्स हो या ना हो.

वैसें मेरा मानना है कि प्यार और डेटिंग में सेक्स तभी सही है जब आप अपने साथी के प्रति वफादार हैं. लेकिन आज लड़के ही नही लड़कियां भी प्यार सेक्स के लिए ही करती हैं. तो किसी भी चीज का आनंद हो तो उसे बखूबी सही अंदाज से अंजाम दो ताकि उसका पूरा रस तुम्हें मिल पाए.

जरुर बताएं कैसा लगा प्यार पर मेरा चिंतन. साथ ही यह बिलकुल न समझिएगा कि प्यार में सेक्स जरुरी ही है, यह तो बस समय की मांग हो सकती है.



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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Arlen Leichtenberge के द्वारा
February 1, 2017

Those are yours alright! . We at least need to get these people stealing images to start blogging! They probably just did a image search and grabbed them. They look good though!

NIKHIL PANDEY के द्वारा
October 13, 2010

राहुल जी बढ़िया और व्यवहारिक चिंतन है आपका ……….जानवर भी जानते हैं कि प्रेम कैसे करना, और आदमी को सीखना पड़ता है. ..एक लाईन में ये अर्थ है की आज समय के साथ सारी परिभाषाये बदल गई है… आज प्रेम सभी मर्यादाओ को तोड़ने का नाम है… ..अमर्यादित प्रेम .यह मन का आत्मा समर्पण नहीं चाहता बल्कि शरीर का समर्पण चाहता है…यह सिमित है कुछ गिफ्ट ,कार्ड, और कुछ विशेष दिनों में . आज प्रेम लस्ट ( भूख ) का विषय है सुख का नहीं ….मै सहमत हु इस बात से की इस सम्बन्ध में बहुत बड़ी क्रांति आने वाली है ..क्यों की आपके तन मन ,,, सोच व्यवहार सपने इछाये सब पर बाजार का कब्ज़ा है… बाजार तय करता है की आप अपने साथी को कितना खुश कर सकते है कैसे खुश कर सकते है …… मुझे आपकी लेख की कुछ पंक्तिया बहुत बेहतरीन लगी… सटीक बाते कही है आपने… युस एंड थ्रो ..का सिद्धांत हमारे जीवन के हर हिस्से पर प्रभावी हो चूका है .. .. ओशो को मैंने बहुत नहीं पढ़ा…. पर जितना जाना है वह यही हैकि ओशो भी जब कहते है की सम्भोग इतना करो की उससे विरक्ति हो जाये,,, और फिर तुम समाधी को प्राप्त हो जाओगे… तो वे भी एक तरह के व्यभिचार को ही प्रोत्साहित कर रहे है ..क्योकि यह प्रेम का हिस्सा है ..अर्थ नहीं है..और अति व्यभिचार का अंत कभी समाधी नहीं हो सकता क्योकि एक व्यभिचारी व्यक्ति तो रोज नए नए.. तरीके ढूंढता है व्यभिचार के…

    राहुल के द्वारा
    October 14, 2010

    निखिल जी, मेरे लेख को पढने और उसे समझने के लिए धन्यवाद. इस लेख को जब मैंने इस मंच पर शुरु किया था तो लगा कि आप जैसे लेखक शायद इसे उतना पसंद न करे लेकिन जिस तरह आपने कमेंट दिया उससे लगा कि सच में प्रेम की शक्ति बहुत होती है. हमने आपके काफी ब्लोग पढ़े है खासकर हिन्दी की यात्रा वाले. ओशो बेशक सेक्स को प्यार से जोड कर देखते हो लेकिन यह भी सच ही था कि उस पशुवत व्यवहार में भी इंसानियत की गंध आती थी, यही मै इस लेख से कहना चाहता हूं.


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